Friday, 26 February 2016

साया

मैं कोई परिछायीं नहीं हूँ कि जो सूरज का रुख बदलते ही अपनी पहचान बदल ले।
मैं एक शख्शियत हूँ जो दिल के बदलावों में बदलाव ला सकता है मन के बदलावों में नहीं।
जो ऐसे नहीं बहेगा जैसे पानी मिट्टी में बह जाता है। और न ही ऐसे रुकेगा जैसे जल सरोवर में रुक जाता है।इसे तो बहना है नदी की तरह जो छल-छल करती हुयी अपनी मंज़िल को निकल जाती है, जो रोके से भी जल्दी रूकती नहीं है कहीं न कहीं से अपना रास्ता बना ही लेती है।इसे बढ़ना है उस आग की तरह जो जंगल में लग जाती है।रहना है उस रेगिस्तान की तरह जिसकी रेत बड़ी से बड़ी चीज़ उड़ा ले जाती है और वज़ूद तक मिटा जाती है। बरसना है उस बादल की तरह जिसकी वर्षा सुख दुःख का एहसास दिलाती है।जीना है उस इंसान की तरह जिसके मन मंदिर में सिर्फ प्यार , हमदर्दी और इंसानियत पायी जाती है।

Saturday, 13 February 2016

Art

Art is ur mind. How it works. It's simple. It's just about a move on paper. What u suppose to do and where u suppose to go. Whatever u draw in piece of paper u r able to turn it in meaningful sense. Your feelings ur quick and flexible decision makes u an artist. How can u step forward, how can u rotate, break n bind the things easily n quickly and howz ur imagination that's all about how better u r. It doesn't matter how I speak but it's always matters what was the purpose behind that. My performance is art of my life. May God help me in my duty, in my creation, in my life and in the art of desire.

Tuesday, 21 July 2015

तू

तुम मुझमें हो । 
तुम मैं नहीं हो।

इस दिल में हो पर
जहन में नहीं हो।

यादों में हो लेकिन 
मेरी हर याद नहीं हो।

मेरे सपनों में हो,
मेरी परछांई नहीँ हो।
मेरी बातों में भी हो पर
मेरे जज़्बात नही हो।

मुलाकातों में तो हो ,
तुम मेरे साथ नहीं हो।

नशा हो मेरा ,हल्का है मगर थोड़ा । ऐ हमदर्द मेरे !सूना है बहुत दिल मेरा। 
अगर याद न आये तेरी ,होता नहीँ मुझमें सवेरा।
जब निकल जाएगी तू इस दिल से
तब मैं हो जाऊंगा घना अँधेरा।

Wednesday, 8 July 2015

art


what is art and how it's related to real life and is it visualization of reality? or beautification of real world on paper ? there are so many thing which i wanna tell you in this article.
when i pass through a mirror i found so many spots in it then i think "ये दाग कहीं मुझमे न हो जाएं" 
when i like to be a simple person i don't know that these spots are of mine or of the mirror.
And when i think inside of myself then i realise "दाग मुझमे हैं mirror तो बस एक ज़रिया है "
Art is just like a mirror of artistist.It shows his expression, his mental state,her sensitivity,his thoughts and his & her flow of love and affection naturally passing and coming from their heart.

Wednesday, 3 June 2015

Why we need success

हमारा डर हमारा control है दुनिया में जीने का ,survive करने का  और साथ ही साथ डर हमारा बोध है conscious level है जो हमारी सोच की उपज और जिंदगी की एक बेहतर दिशा है हमें पता होना चाहिए की कहाँ हमें डरने की जरूरत है और कहाँ हिम्मत दिखाने की। डरना हमेशा उस चीज़ से चाहिए जिसके बारे में हम कुछ भी नहीं जानते हैं जो हमसे और हम जिससे पूरी तरह अनजान हों।   
हम छिपकली को भगाते हैं अपने कमरे से ,क्योंकि हम डरते हैं उससे या उसकी activity से ,उसके natural nature&behavior से।
रास्ते में भौंकते हुए कुत्तों को पत्थर मारकर भगाते हैं या बिना देखे डर को काबू में करके धड़कन normal रखकर ,mind normal and quite रखकर आराम से वहां से निकल जाते हैं । हम जानवरों को डराते हैं क्योंकि हम उनसे डरते हैं और अपने डर से निजात पाने के लिए या फिर उस situation को overcome  करने के लिए या हर बार आपके साथ या बार-बार किसी और के साथ कोई घटना न हो जाये ,इसके लिए जानवरों को डर का एक सबक देने की कोशिश करते हैं।(यहाँ मेरा मकसद जानवरों को नुक्सान पहुँचाने से बिलकुल भी नहीं है मैं यहाँ एक general thinking और एक आम  इंसानी सोच को represent कर रहा हूँ कि जिससे हमें डर लगता है उस डर से निजात पाने के लिए हम उसे डराने की कोशिश करते हैं कदम -कदम पर गिराने की कोशिश करते हैं ,हर जगह जहाँ भी मौका मिलता है उसे बदनाम करने की कोशिश करते हैं उससे दुश्मनी बसा लेते हैं अपने दिल में।)
ठीक ऐसा ही इंसानों के साथ होता है इंसान हमेशा दूसरे इंसान से डरता है ,insecure महसूस करता है ,ईर्ष्या करता है या comptite करने की कोशिश में लगा रहता है।कोई भी नया idea उसको आता है जल्दी share करना नहीँ चाहता । डर! डर भरोसे में कमीं आज के दौर में आज के समय।ये सिर्फ इंसानी सोच में लंगड़ापन /अपंगता है और कुछ नहीं।
डर क्या है ?हम तो सांप से भी डरते हैं शेर से भी डरते हैं बिच्छु से भी डरते हैं चींटी से भी डरते हैं और यहाँ तक भी हम अपने आप से भी डरते हैं और जब भी हमें डर लगता है तो हम frustrated हो जाते हैं और फिर दूसरों पर अपना frustration निकालने की कोशिश करते हैं तरीके बहुत सारे होते हैं लेकिन सबका मकसद और result एक ही होता है।डर!डर पैदा करना।इसको पैदा करने के नए नए तरीके इज़ात करना।आतंक भी डर के बलबूते पनपता और फैलता है।
हिम्मत एक ऐसी ताकत है जो हमारे डर को काबू में रखती है और साथ ही साथ हमारे एहसास और potentials में बदलाव करती है जिससे हम चीज़ों से useto हो जाते हैं और हमारा डर  खत्म होता जाता है। यही समय के साथ हमारा experience बन जाता है और इसी एक्सपीरियंस को साथ में लेकर हम दूसरों के डर  को काबू में करने या खत्म करने में जुट जाते हैं जो समय के साथ -२ दूसरों का एक्सपीरियंस बनता जाता है।
आज इंसान जब भी success की पहली सीढ़ी चढ़ता है उसका डर कम होता जाता है जिसे वो पहले अपना डर समझता था उसमे गिरावट आने लगती है और साथ हि साथ उसके नए डर शुरू भी होते जाते है ।(security,money,bank balance,shares ,family )

Tuesday, 2 June 2015

Universe मेरा नजरिया मेरी खोज

मेरा मानना है कि ब्रह्माण्ड भी एक इंसान है जो हमें उस नज़रिये से देखता है जैसे हम चींटी जैसी छोटी प्रजातियों or माइक्रोस्कोपिक जनजातियों को देखते हैं।एक छोटी प्रजाति जिसके केवल समूह के बारे में हम  जानते हैं ।जिसका नाम ,व्यवहार ,फायदा ,नुक्सान,वंसज,विशेषताएं हम जानते हैं या जानने की कोशिश में लगे रहते हैं।हम उसकी एकता जानते हैं उसका आचरण जानते हैं लेकिन न तो हम उसकी feelings जानते हैं ,न उनकी बोली जानते हैं समझने की कोशिश कर सकते हैं लेकिन जान नहीं सके और न हि हम उनकी सोच जान सकते हैं और समझ सकते हैं।शायद ब्रह्माण्ड में हम चीटियों से भी छोटे हों या फिर इतने छोटे कि शायद उसको हमारे बारे में इस मानव जाति के बारे में मालूम ही न हो।वो शायद हमारी हि तरह जनजातियां और प्रजातियां खोजने में लगा हो याफिर उसके लेवल पर इस तरह की कोई चीज़ ही नही होती हो जिससे उसे इस तरफ सोचने का मौका मिले।उसकी सोच ही different हो जहाँ जीना-मरना,जीवन-जनजाति,सोच-दिमाग,व्यव्हार-नेचर ये सब किसी भी माईने में न हों।क्या पता उनका काम इस सब के परे किन्हीं और मूलभूत आवश्यकताओं पर टिका हो जिसका हमारी दुनिया की किसी भी चीज़ से कोई लेना देना न हो।वो इस सब से बहुत बड़ा हो जिसको हमारी सोच भी न सोच सकती हो।
जैसे बहती हुई नदी को ये नहीं मालूम होता कि उसके साथ कंकड़ भी बह रहे हैं।दो कंकड़ आपस में बहस कर रहे होते है -एक बोलता है कि मैं इस नदी को रोक के दिखाऊंगा तो दूसरा कहता है देखता हूँ मैं तू कैसे रोकता है नदी को और दूसरी तरफ बहती नदी है जिसे ये भी नहीं पता कि उसमे दो कंकड़ हैं जो उसको लेकर लड़ रहे हैं उनकी बातें or conversation पता होना तो बहुत दूर की बात है ,उसका काम है बहना और वो बहती जा रही है, ऐसी ही हमारी स्थिति है ब्रम्हांड में ।
जो चीज़ हमें regular और रूटीन में दिखतीं हैं हमें वो सारी दुनिया की चीजें systematic और symmetric दिखती हैं लेकिन हमें पता ही नहीं होता कि चीजें इतनी छोटी या इतनी बड़ी भी हो सकती हैं। जिसके systematic होने का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते थे, उनके माईने उसके आकर ,उसकी position,shape की बदौलत हमारी उम्मीद से बिलकुल हट कर हो जाती है।जब तक पृथ्वी को बाहर से नहीं देखा गया तब तक कोई मानने को भी तय्यियार नहीं था कि पृथ्वी गोल और गेंदाकार है। सब उसको चपटा ही समझते थे। बिलकुल ऐसा ही आज है जब तक फुल प्रूफ न दो तो कोई बात मानने को तय्यियार ही नही होता है । सारी चीज़ें बहुत छोटे और बहुत बड़े लेवल पर हमें सिमेट्रिक और सिस्टेमेटिक दिखती हैं  शायद वो इतनी उबड़-खाबड़ हों लेकिन उनकी speed उनकी बनावट हमारी आँखों को धोखा सा देती हैं।जैसे-running fan ,spinning earth seemed to be circular or spherical because of their speed and microscopic corner of table and telescopic surface of the sun by shape seems same.I think it's a natural gift given to us given by nature.how we can see,think,imagine speed ,shapes,colors,feelings.?
i don't know universe is a start like a rising sun or end like sunset.

Thursday, 21 May 2015

हिंदी and english

हिंदी and english  ये दो भाषाएँ या  फिर हमारी जरूरत,एक संचार का माध्यम और अपनी या किसी भी बात को किसी के द्वारा किसी के समक्ष पेश करने का सरल और आसान तरीका
या फिर एक दौर ,नया चलन ,पढ़े-लिखे की मानक ,फैशन ,लड़ने -झगड़ने का तरीका ,क़ाबलियत साबित करने का तरीका ,बात को मनवाने या फिर खुद को सही साबित करने की भाषा या फिर माध्यम ,दूसरों को लुभाने का और खुद को कुछ अलग सा दिखाने का सरल उपाए या फिर एक ज़रिया। पार्टी organize करनी हो ,ऑफिस में लोगों से बात करनी हो ,बहुत सारे लोगों से मिलना और बात करना हो तो हम सब लैंग्वेज में बहुत फोकस करते हैं और बातों को चटपटा ,स्टाइलिश और बोल्ड बनाने की कोशिश करते हैं। हमारी बातें कुछ फॉर्मल ,कुछ में attitude के साथ इग्नोरेंस ,कुछ mature ,कुछ बचपने से भरी हुई होती हैं। ये लैंग्वेज ,बॉडी लैंग्वेज और ओवरऑल पर्सनैलिटी का कमाल है। जब कभी बड़े लोगों से मिलना हो उनसे बात करनी हो ,लड़कियों को इम्प्रेस करना हो,
जब समझौते हों या तकरार हो ,जब हमें अपनी सही-गलत बातें किसी के सामने रखकर खुद को साबित करना हो ,खुद को इंटेलीजेंट साबित करना हो ; इन सबमें आज हिंदी की महत्ता इंग्लिश से कम होती जा रही है।
ये केवल भाषा या फिर राष्ट्र भाषा की बात ही नहीं है और न ही मुझे इंग्लिश से कोई नफरत है।
बात बस इतनी नहीं है कि आज लोग हिंदी बोलने , पढ़ने से सकुचाते हैं बल्कि आज वो दुनिया के समक्ष खुद की बेइज़्ज़ती सी महसूस करते हैं और हिंदी को नफरत की निगाहों से देखने लगते हैं। हिंदी गानों ,साहित्यों ,पत्रिकाओं ,कविताओं और नारों की संख्या में भारी मात्रा में कमी आ रही है और तो और लोगों की दिलचस्पी भी खत्म होती जा रही है। आज की सोच में पंजाबी और इंग्लिश मिक्स रॉक्स और योयो टाइप ,जस्ट चिल ,कॉम ,shut up, फ़क ऑफ जैसी लैंग्वेज और ऐसे मुद्दे आज के युवाओं को ज्यादा लुभा रहे हैं और ये सब बढ़ती और जरूरत से ज्यादा फ़ास्ट और सबकुछ तुरंत /जल्दी पाने की इच्छा रखने वाली दुनिया का नतीजा है। आज खाना बनाने की जरुरत नहीं पड़ती क्यूंकि आपका मनपसंद खाना जो १०-१5  मिनट में आपके घर तक डिलीवर हो जाता है। कपडे धोने की जरूरत नहीं पड़ती क्यूंकि लॉन्ड्री वाला आपके घर से कपडे लेकर ,उनको धोकर ,प्रेस करके शाम तक आपके घर पर दे जाता है। घर से बाहर निकलने की जरूरत नहीं पड़ती क्यूंकि इंटरनेट पर ही जरूरत का बहुत सारा काम हो जाता है। क्लास में ज्यादा पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ती क्यूंकि एग्जाम आते आते इंटरनेट पर एग्जाम से रिलेटेड सब कुछ मिल ही जाता है।
आप सब को लग रहा होगा कि मुझे फ़ास्ट दुनिया और उसके चलन से कोई डर या नफरत सी हो गयी है तो मैं आपको clear करना चाहूंगा कि मैं भी उसी दुनिया का एक हिस्सा हूँ एक भाग हूँ।जब आप मुझमे झांक कर देखेंगे , आप मुझमे भी वैसी ही सी एक दुनिया पाएंगे। मैने भी जाने-अनजाने में बहुत सी चीज़ों को एक्सेप्ट किया लेकिन कभी भी किसी चीज़ को खुद पर हावी नहीं होने दिया। 
आज आप किसी 5* restaurant or multinational companies में जाते हैं तो वहां पर भी आपको हिंदी या इंग्लिश में conversation करना पड़ता है आपके मुह से कुछ बोलते ही आपको महसूस होने लगता है की आपकी भाषा के आधार पर आपकी पेर्सनालिटी judge करली गयी है ।आपकी personality के आधार पर लोग आपको deal करने लगते हैं 
अगर आप किसी भी तौर तरीके में कमतर हो तो आपको आपकी परिस्थिति के अनुसार वो deal करेंगे behave करेंगे और late करंगे ।पहले वो अपने पुराने ग्राहक और बड़ी पार्टी वालों को डील करेंगे फिर आप तक आएंगे और हो सकता है कि आप बेवकूफों की तरह इंतज़ार ही करते रह जाएँ और टाइम निकलता जाये and आपका number आये ही नहीं।ये दशा है आज हमारे देश की जो इंसान को इस तरह से    महसूस कराती है साथ ही साथ उसमें कोई कमी है ऐसा एहसास दिलाती या कराती है।
हर एक भाषा का महत्व उसके एक्शन एरिया में होता है चाहे वो लोकल भाषा का लोकल एरिया हो ,या हिंदी भाषा का हिंदी भाषी एरिया या english का इंग्लिश माध्यम।
किसी भी चीज़ के सही -गलत के माईने कब बनते हैं जब उसको सामाजिक स्वीकृति मिलती है। समाज जिसके साथ होता है वही टिक पाता है किसी भी पर्सनालिटी को जज करने के लिए हम उसके अच्छे पहलु देखते हैं ,बुरे पहलु देखते हैं और फिर दोनों  पहलुओं को मर्ज करके उसकी पर्सनालिटी की इमेज दिमाग में बैठा लेते हैं वो इमेज ही उसकी इम्पोर्टेंस decide करती है कि कैसी भी परिस्थिति में किसे कैसे डील करना है। अगर आपका लहजा ,बात करने का तरीका सब बिलकुल परफेक्ट हो तो भाषा चाहे कोई भी हो और कोई न भी हो , कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता।जैसे प्यार की कोई भाषा नहीं होती है प्यार तो आँखों ही आँखों में हो जाता है एक इशारा ही काफी होता है पूरा मतलब समझने के लिए ,एक नज़र ही काफी होती है प्यार जताने के लिए। भाषा तो इशारों में भी होती है ये  communication का पार्ट है भाषा लिखी जाती है ,पढ़ी जाती है ,बोली जाती है ,सुनी जाती है ,express की जाती है आप अगर अपनी बात दूसरे को समझने में कामयाब होगये तो आपकी भाषा और आपका माध्यम एक सफल भाषा और एक सफल माध्यम का प्रतीक है। अगर भाषा को आप गलत तरीके से यूज़ कर रहे हो तो इसमें भाषा का कोई कसूर नहीं है इसमें कसूरवार खुद आप हो जो भाषा को माध्यम बनाकर गलत पर गलत किये जा रहे हो।
बेशक हिंदी एक सरल माध्यम है अपनी बात कहने का हिंदी जैसी भाषाओँ के भाषियों के समक्ष लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की हिंदी जटिलताओं से सरलता में बदल रही है सिर्फ एक माध्यम के तौर पर। आज लोग बड़े बड़े फंक्शन्स में ,film fare अवार्ड्स  में हिंदी और उसके कठिन शब्दों को मजाक के तौर में इस्तेमाल किया करते हैं और लोगों को एंटरटेन करते हैं।मैं  इस पर कोई कमेंट नहीं करूंगा कि ये सही या गलत और मैं आज इस बात से भी इंकार नहीं कर पाउँगा कि आज हमें हिंदी -उर्दू जैसी भाषाओँ की वैसी जरूरत नहीं रह गयी जैसी पहले हुआ करती थी। आज के मॉडर्न समाज में हिंदी की घटती लोकप्रियता ,हिंदी  कमतर इस्तेमाल ,मॉडर्न प्रचलन में हिंदी की नाममात्र की सहभागिता ,हिंदी को मॉडर्न समाज से पिछड़े समाज की तरफ धकेलती जा रही है क्योंकि पढ़ा लिखा समाज हिंदी की घटती लोकप्रियता के कारण ,हिंदी के इस्तेमाल को अपनी शान में गुस्ताखी समझता है और चाहते हुए भी इसके इस्तेमाल से खुद को दूर रखने लगता है।
english के प्रभाव को कभी काम नहीं आकां नहीं जा सकता और न ही उसको कोई बढ़ने से रोक सकता है। जैसे कोई भगवान को नहीं छोड़ता चाहे वो उसे जिस भी रूप में क्यों न अपनाये वैसे ही कोई भाषा को नहीं छोड़ सकता फिर चाहे वो भाषा से कैसे भी जुड़ा क्यों न हो। इन दोनों चीज़ों के तार दिल,दिमाग और आत्मा से जुड़े हैं जो हमें हमारे बचपन से लेकर हमारे आज तक हम सभी को विरासत में मिले हैं।
जरुरत है सब की पोजीशन के हिसाब से ,स्थान के  हिसाब से ,सिचुएशन की गंभीरता और कार्य की जटिलता देख कर भाषा का चुनाव कीजिये और अपनी बात सरल करने का उसे माध्यम बनाइये। नफरत किसी भी भाषा से मत कीजिये  और अगर लगता है  कोई भाषा कमतर है या फिर अच्छी नहीं है या आपके लायक नही है तो दो काम किये जा सकते हैं अगर हो सके तो उसे बेहतर बनाने का प्रयास कीजिये या फिर उसको समझने और उसके बारे में किसी भी जानकारी को अपनी जिंदगी  का हिस्सा मत बनने दीजिये बस जानिए की वो exists करती है आपको समझ नहीं आती है आपकी समझ के बाहर है तो किसी ऐसे व्यक्ति या ऑपरेटर ,ट्रांसलेटर,कनवर्टर से कांटेक्ट करिये जो आपको वो बात आपकी  समझा दे। its  too  easy .
कोई भी जानकारी जो सिर्फ आपकी भाषा की पकड़ की वजह से आप तक नहीं पहुँच पायी ,ऐसी सिचुएशन आपके लिए लाभप्रद भी हो सकती है और हानिकारक भी,its  depends on your situation एंड your destiny .
जैसे दिल के रिश्तों का मतलब ही जान-अनजान से है। बुझता और अनभिज्ञता भी बहुत से कारणों का स्वयं में एक हल है अगर जिंदगी का समस्या से वास्ता ही न पड़े तो जिंदगी में कैसी समस्या।
now a days english is our formal language and टूटी-फूटी english is our general language.और भाई पंजाबी तड़का जब लग जाये तो मजा हि आ जाता है पंजाबी मिक्स रॉक्स ,जरुरत बन गयी है आज की, इंग्लिश! ,पढाई-लिखाई ,मेट्रोज ,एयरलाइन्स,कोर्ट्स ,मॉल्स ,गेम्स,abroad ,इंटरनेट ,email ,mobiles ,रेलवे टिकट irctc इत्यादि। लगभग सभी जगह आज अंग्रेजी बहुत धड़ल्ले से /ज्यादा यूज़ हो रही है और आज के इस नए ज़माने में इसका महत्त्व भी बहुत बढ़ गया है या ये भी कह सकते हैं की हमारे हिंदी प्रधान समाज ने मॉडर्नाइजेशन के साथ साथ इसका महत्व इतना ज्यादा बढ़ा दिया है जिसे कम कर पाना लगभग नामुमकिन है। In case of English :
generally you are pretending to be qualified.you think it's a more powerful way of touching heart with no guilt like love.
अगर आज के नज़रिये से देखें तो प्यार  में शब्दों का भाव भी भाषा का एक रूप प्रदर्शित करता है जैसे कि ;
मैं आपसे प्यार करता हूँ। ……… डार्लिंग i love you .
क्या तरीका है क्या फीलिंग है सब बकवास ,ये एक नजरिया है जिससे इंसान तौलता है अपनी और आपकी जिंदगी के तराजू में ,वो  देखता है कि आप कितने एडवांस हो कितने रोमांटिक हो। किसी और के सामने आपके bf या gf को लेकर आप कभी मायूस तो होगे। ये लैंग्वेज का फ़र्क़ है जब इंसान सोचता है कि आप उसके लेवल के हो भी या नहीं। लैंग्वेज के इस्तमाल करने के तरीके की वजह से आज शब्दों का भाव ,प्यार का भाव ,जिंदगी , सोच  … सामाजिक मामले में कहीं हद तक लैंग्वेज choice and  interpretation ही  तय कर देती है। आज का समाज मानता है की हिंदी एक पुराना तरीका होगया है वेद,पुराण तक ही सीमित  रह गया है बाबा आदम के ज़माने की भाषा है ये ,इसका प्रयोग करके एडवांस लोगों की इज़्ज़त का भाव गिर जायेगा। उनकी शान में गुश्ताखी हो जाएगी। English is an advance language and the whole world is using it as mother tongue or international language. ये चलन में है ,इसका एक स्टेटस है ,बड़े लोग इसका इस्तेमाल करते हैं खुद को और बड़ा  लिए। ये सोच है आज की। ये बिलकुल गलत है लेकिन अफ़सोस यही सच है आज हिंदी कमजोरों की निशानी के तौर पर पहचानी जा  मन सम्मान सब हथेली पर लेकर चलते हैं ताकी जब जरुरत पड़े बड़ी आसानी से धो सकें।हिंदी और हिंदी भाषी की चुटकी ले सकें। जब कोई शुद्ध हिंदी बोलता है तब बहुत से  उसे घूर घूर कर   प्राणी आ गया ये ,कहाँ से बिलोंग करता है ये ,ये घटिया सोच रहती है अधिकतर की।
मैं हिंदी और अंग्रेजी दोनों में से किसी को भी गलत नहीं मानता हूँ मेरा मानना ये है कि समाज और दुनिया चलन को देखती है तथ्य नहीं। फैशन देखती है अपनाती है मूल भाव नहीं।
as a cool guy कोई बंदा  या बंदी आज की date में हिंदी को ही बस अपनाता है तो बहुत सी चीज़ें वो या तो खुद में कम पाता  है या फिर सामने वाला उसका बहुत छोटा आंकलन करता है वहीँ दूसरी ओर इंग्लिश के आस्पेक्ट में इंसान खुद में एक कॉन्फिडेंस महसूस करता है चाहे वो झूठा ही क्यों न हो। 
मैं इसको भाषा का कसूर नहीं मानता हूँ  लेकिन मैंने कई बार इंग्लिश को लोगों के झोठे सच का सहारा बनते हुए देखा है की झूठ बोलने के लिए किसी पर हावी होने के लिए कैसे ओग इंग्लिश का सहारा लेते हैं तक समाज उनको एक सभ्य की तरह डील करे ,चाहे वो जितनी भी अभद्रता क्यों न कर चुके हों। झूठ का सच के मुखोटे में लिपटा होना,झूठ को बड़ी सफाई से हक़ के साथ अमलीजामा पहनाना ,,बुराई हो ,अश्लीलता हो,अभद्रता हो या फिर बेबसी,ये सब कुछ सबके सामने बड़े सुन्दर तरीके से परोसने और सबसे जोर देकर मनवाने में लोग इंग्लिश का बहुत अच्छी तरह यूज़ करते हैं। 
मैं ये जनता हूँ कि ये सिर्फ मेरा वहम है इसमें इंग्लिश और हिंदी का या फिर और किसी चीज़ का कोई दोष नहीं है लेकिन यहाँ ये कहना मैं लाज़मी समझूंगा कि इंग्लिश को हमने जन्म नहीं दिया है , हमने केवल समझा और अपनाया है इसे  और शायद पूरी तरह अपना भी नहीं पाएं हैं हम इसे ,लेकिन हिंदी में हमारा और हमारे देश का जन्म हुआ है हम इसकी और ये हमारी पहचान है ,ये हमारी धरोहर है जब हम अपने देश से अलग थलग बाहर किसी देश में पड़े होते हैं तब हम इसके महत्व को शायद अच्छी तरह से समझ पाते हैं हिंदी को हमने जन्म दिया है ,इसे अपनाया नहीं है अब लगता है शायद इसे हम पूरी तरह जिन्दा भी नहीं रख पाये हैं क्यूंकि हम शायद अच्छी तरह समझते नहीं हैं कि  बात कहने के लिए  भाषा चाहिए ,माध्यम चाहिए और समझने वाले का समय और उसकी कद्र भी करनी आनी चाहिए। इसलिए आपको जो अच्छे से आता हो उसे दिल से कहो ,जरूरी नहीं है हिंदी! अंग्रेजी में कहो। लेकिन अपनी लैंग्वेज तो अपनी लैंग्वेज होती है इसका फ़र्क़ आपको विदेशों में दिखेगा, जब महीनों तब आपके कानों में हिंदी का एक वर्ड तक नहीं पड़ेगा ,तब आपको इसकी याद आएगी क्योंकि आपकी मदर टंग आपकी जरूरतों ,आपके समाज और आपके सम्मान की धरोहर होती है ,इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए। पर आज इस बात को भी सिरे से नकार नहीं सकते कि इंग्लिश आज हमारे दिल ओ दिमाग पर इस कदर हावी है , हम सोच कर भी उससे अलग नहीं हो सकते। हिंदी का भी यही हाल है।  हमारा दिल ,हमारा दिमाग हिंदी का आदी है सुनकर ,सोचकर और बोलकर,,,,चाहे कुछ भी करलो लेकिन उससे अलग ,उससे अछूते नहीं रह सकोगे। 
एक बात का ध्यान हमेशा रखना-   
चलन हमसे बनता है हम चलन से नहीं।  
फैशन हमसे बनता है हम फैशन से नहीं।
शुरुआत करो चीज़ों की खुद पर थोपो नहीं कभी। 
अपनाओ तभी चीज़ों को जब उसमे कुछ अपना सा लगे। 
बह जाओ उसी के साथ जब वो बहने को कहे। 
थम जाओ उसी के पास जब रुक -रुक कर वो चले। 
परवाह नहीं है भाषा की चाहे वो जो कुछ भी हो। 
परवाह तो बस समझ की है क्या पता वो ये समझती ही न हो।